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Thursday, 1 November 2018

Seven Social Sins Of Gandhi ji | गांधी जी के सात सामाजिक पाप

 Seven Social Sins Of Gandhi ji




  • Politics without principles.
  • Wealth without work.
  • Pleasure without conscience.
  • Knowledge without character.
  • Commerce without morality.
  • Science without humanity.
  • Worship without sacrifice.


गांधी जी के सात सामाजिक पाप



1. सिद्धांतों के बिना राजनीति ।

2. काम के बिना धन ।

3. विवेक के बिना सुख ।

4. चरित्र के बिना ज्ञान ।

5. नैतिकता के बिना वाणिज्य ।

6. मानवता के बिना विज्ञान ।


7. कुर्बानी के बिना इबादत ।

Tuesday, 30 October 2018

UPDATES ON DELHI AIR POLLUTION

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दिल्ली के पहले ही apocalyptic हवा ने मंगलवार को बदतर के लिए एक मोड़ ले लिया, सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (EPCA) ने कहा कि यह राजधानी में निजी वाहनों की चलाने रोक सकता है सब एक साथ अगर हवा की गुणवत्ता में और अधिक खराब ।

EPCA के चेयरमैन भुरे लाल ने कहा, ' हमें उम्मीद है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति न बिगड़े वरना हमें निजी वाहनों की चलाने बंद करनी पड़ेगी । केवल सार्वजनिक परिवहन का उपयोग किया जाएगा.
कुल मिलाकर वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 3 बजे ४०१ था, ' गंभीर ' श्रेणी में गिरने, सबसे अधिक इस मौसम-कि जब अंयथा स्वस्थ व्यक्तियों को गरीब हवा से नुकसान हो रही शुरू करते हैं ।
EPCA के पूर्व emptive चेतावनी के लिए कारण, शरीर में सूत्रों ने बताया, एक मुलाकात विभाग से एक चेतावनी के संबंध में एक "पश्चिमी अशांति दिल्ली आ रहा है."



"एक पश्चिमी अशांति दिल्ली आ रहा है और बढ़ी हुई नमी के संयोजन यह संभावना है कि हवा की गुणवत्ता काफी डुबकी जाएगा बनाता है । इसका मतलब यह है कि वहां एक तत्काल मौजूदा वायु प्रदूषण के लिए अग्रणी कारकों के खिलाफ कार्रवाई करने की तत्काल जरूरत है, "स्रोत ने कहा ।
सीएसई के कार्यकारी निदेशक अनुमिता रायचौधरी ने कहा कि यह एक स्थाई उपाय नहीं है, लेकिन मौसम की स्थिति बदलने के कारण एक आवश्यक है ।

"वे रैंप कर रहे है के रूप में मौसम की स्थिति बदल रहे हैं । 1 नवंबर से 10 दिन तक निर्माण गतिविधियां रोकी जाएंगी । लेकिन यह पूर्व emptive कार्रवाई की जरूरत है कि अभी किया है, "उसने कहा ।

अपंग परिवहन व्यवस्था बनाम प्रदूषणकारी फोर व्हीलर्स

लेकिन केवल सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए बदलाव आसान होगा किया तुलना में कहा ।

शहर को ११,००० बसों की जरूरत है-इसमें सिर्फ ५,४२९ बसें हैं । राजधानी में ४६४ मार्गों में से बसें नहीं चलने पर पांच जबकि ७५ रूटों पर सिर्फ एक बस संचालित है । करीब आधे (२३०) रूटों पर एक से पांच बसों का संचालन होता है ।

स्थिति के रूप में क्लस्टर सेवाओं में गंभीर है, दिल्ली एकीकृत मल्टी मोडल ट्रांजिट सिस्टम (DIMTS) द्वारा प्रबंधित के रूप में ४० अपने १४७ मार्गों के बस एक से पांच बसों प्रत्येक द्वारा सेवा कर रहे हैं । साथ में वे दिल्ली मेट्रो की तुलना में ज्यादा ट्रिप लेते हैं ।

सीधे शब्दों में कहें तो राजधानी की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पंगु हो गई है.

लेकिन अब तक पंजाब और हरियाणा में पिछले सालों की तुलना में फसल जलती कम हुई है । नासा के आंकड़ों के अनुसार, वहां आग के १५,८८६ उदाहरण दिया गया है-पिछले चार वर्षों में सबसे कम और ४३% आग की संख्या से भी कम के आसपास पिछले साल इसी अवधि के दौरान पता चला (२७,९९६) । "लेकिन यह आने वाले सप्ताह में बदल सकता है और हमें डर है कि मौजूदा प्रदूषक मामलों बदतर बना सकता है," CPCB के एक अधिकारी ने कहा ।

लेकिन चाहे, वाहनों प्रदूषण प्रमुख रहता है-न सिर्फ अक्टूबर और नवंबर के महीनों के दौरान, लेकिन साल भर ।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत वायु गुणवत्ता और मौसम की भविष्यवाणी और अनुसंधान (सफ़र) की प्रणाली के द्वारा एक अध्ययन में पाया गया भारी वाणिज्यिक वाहनों और निजी स्वामित्व वाले वाहनों के बीच प्रदूषण के लिए प्रधानमंत्री के योगदानकर्ताओं के बीच थे, सूत्रों के बीच एक 25-४५ प्रतिशत शेयर के साथ ।

अब तक दिए गए दिशा-निर्देश

राज्य सरकार और EPCA ने पहले ही प्रदूषण की जांच के लिए कई उपाय लागू किए हैं, जिसमें नवंबर से दिल्ली-एनसीआर में निर्माण गतिविधियों को रोक लगाने सहित 1-10 स्टोन क्रशर और डस्ट प्रदूषण उत्पन्न करने वाले हॉट मिक्स प्लांट भी रहेंगे 10 दिन के लिए बंद कर दिया । ईंधन के रूप में कोयला और बायोमास का उपयोग करने वाले उद्योग (ऊर्जा संयंत्रों को थर्मल और अपशिष्ट को छोड़कर) 4-10 नवंबर से दिल्ली-एनसीआर में भी बंद रहेंगे ।

इसके अलावा प्रशासन ने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की चेकिंग तेज कर दी है और डीजल gensets की आवश्यकता से बचने के लिए एनसीआर में बिजली आपूर्ति बाधित करने के लिए प्रयास किए हैं ।

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लोकतंत्र में चुनावी जागरूपता जरूरी है| परिपक़्व लोकतंत्र




 आपराधिक मामलों में फंसे नेताओं के चुनाव लड़ने पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे संसद के विवेक पर छोड़ दिया है. अब समस्या यह है कि क्या संसद खुद कोई ऐसा कानून बनायेगी, जिससे कि संसद को दागदार छवि वाले नेताओं से मुक्त बनाया जा सके? क्योंकि, आज एक भी ऐसी पार्टी नहीं है, जिसमें ऐसे नेता न हों, जिनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक मामले न हो. इस फैसले के मद्देनजर कुछ बातें अहम हैं, जिन्हें समझना जरूरी है. पहली बात तो यह है कि ‘पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट’ में चुनाव लड़ने के लिए क्वालिफिकेशन और डिसक्वालिफिकेशन, दोनों से संबंधित प्रावधान हैं.

लिली थामस के एक फैसले में यह बात कही गयी थी कि जब किसी व्यक्ति पर आरोप साबित हो जाये, तो वह चुनाव नहीं लड़ सकेगा. यह अरसा पहले की बात है. यही वजह है कि चारा मामले में फंसे लालू प्रसाद यादव को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया था.

अब सुप्रीम कोर्ट का यह कहना है कि संसद को कानून बनाना चाहिए, ताकि राजनीति में अपराधी व्यक्तियों का आगमन न होने पाये. लेकिन, अगर कानून बना देने से राजनीतिक या चुनावी प्रक्रिया साफ हो जाती, तो यह राजनीति बहुत पहले स्वच्छ हो गयी होती.

एक कानून तो है ही कि संसदीय चुनाव में एक प्रत्याशी 75 लाख रुपये खर्च कर सकता है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा ही खर्च होता है. इससे यह बात साफ है कि सिर्फ कानून बना देने से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता है. कानून तो यह भी कहता है कि आदमी तब तक निर्दोष होता है, जब तक उस पर अपराध सिद्ध न हो जाये और जब तक वह निर्दोष है, तब तक तो वह चुनाव लड़ ही सकता है.
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ऐसे में यही लगता है कि अगर संसद कोई ऐसा कानून बनाती भी है, जिसमें किसी पर कोई आरोप होने पर वह चुनाव लड़ने से वंचित हो सकता है, तो इससे होगा यह कि चुनाव से पहले ही दूसरी पार्टियों के प्रत्याशियों पर कोई नेता केस करके उसे फंसा सकता है, ताकि वे चुनाव न लड़ सकें. यही बुनियादी दिक्कत है, जिसे समझने की जरूरत है.
अगर हमें अपनी राजनीति में अच्छे लोगों को लाना है, तो सिर्फ कानून बनाना ही काफी नहीं है. ऐसी बहुत-सी बुनियादी बातें हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है. सबसे पहले हमें चुनाव सुधार के बारे में सोचना होगा और देखना होगा कि हम किस तरह से चुनावी सुधार करें, जिससे कि उसमें कोई लूप होल न नजर आये.
जब तक चुनाव में मनी-मसल (पैसा और पावर) का मसला बना रहेगा, तब तक चुनाव सुधार हो ही नहीं सकता. जिस दिन मनी-मसल का मसला खत्म हो जायेगा, उस दिन एक ईमानदार व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकेगा और वह दिन हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत ही शुभ होगा.

देश की जनता अपने नेताओं को इसलिए वोट देती है, ताकि वे नेता उनके लिए काम कर सकें. यानी सड़क-बिजली-पानी से लेकर तमाम जमीनी कामों और जरूरतों को जनता तक मुहैया करा सकें. यही सबसे बड़ी समस्या है जागरूकता न होने की. हमें यह बात समझनी होगी कि हमारे जनप्रतिनिधियों का काम जनता का प्रतिनिधित्व करना तो है, लेकिन अच्छे कानून लाकर और संसद एवं विधानसभाओं में बजट पास करके ही प्रतिनिधित्व करना है.

संसद सदस्यों या विधानसभा सदस्यों का काम जमीनी काम करवाना नहीं है, बल्कि यह काम सरकार का है. हां, उस सरकार में भले कुछ जनप्रतिनिधि हो सकते हैं. जनता जिस दिन यह बात समझ जायेगी, उस दिन वह वोट बैंक नहीं बनेगी और न ही वह किसी बाहुबली को वोट देगी. इस जागरूकता से ही जनता द्वारा विधायकों या सांसदों के चुनाव में बदलाव आयेगा.

फिलहाल जो चुनावी प्रक्रिया है, उसमें सिर्फ क्वालिफिकेशन या डिसक्वालिफिकेशन से काम नहीं चलेगा. इस प्रक्रिया को इको-कैंपेन बनाना होगा.
मसलन कि प्रचार-प्रसार का तरीका ठीक करना होगा. दूसरी बात यह कि लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि वे लोगों को चुनते ही क्यों हैं? वहीं, पार्टियों पर भी यह दबाव होना चाहिए कि वे खराब छवि के लोगों को टिकट ही न दें.हमारी शिक्षा प्रणाली यह नहीं सिखाती है कि हम संसद और विधानसभा सदस्यों को क्यों चुनते हैं. यह जागरूकता का विषय है. सिर्फ यही प्रचार किया जाता है कि वोट देना जनता का अधिकार है और जनता को लगता है कि उसका अधिकार यही है कि वह पांच साल में सिर्फ एक दिन या एक बार वोट दे दे.

इसलिए उस वक्त उसे जो ठीक लगता है, उसे वोट देकर पांच साल के लिए चुप हो जाती है. जनता को यह सोचना चाहिए कि वह उन लोगों को चुनकर भेजे, जो उनका नेतृत्व कर सकें. जनता को हमेशा यह सोचना चाहिए कि वह अपने प्रतिनिधि से पूछे कि वह देश का नेतृत्व कैसे कर रहा है. सिर्फ अपना काम कराने के लिए जनता को अपने प्रतिनिधि के पास नहीं जाना चाहिए.

बीते दो दशक में हमारी चुनावी प्रक्रिया में काफी सारे बदलाव आये हैं. साल 2000 के शुरू में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि चुनाव लड़ने जानेवाले प्रत्याशियों को यह बताना होगा कि उस पर कोई केस तो नहीं चल रहा है, अगर चल रहा है, तो उस पर कार्रवाई हो रही है या नहीं. अब हमें यह देखना है कि इस प्रक्रिया को हम आगे कैसे सुधार के तौर पर ले आते हैं. यानी चुनाव के पूरे इको-सिस्टम को सुधारना होगा, ताकि जनप्रतिनिधियों की गुणवत्ता बेहतर हो सके|



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